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चेतना और शुद्ध विचार ही उर्जा रूप में हमारी सृष्टी के वाहक हैं । विचार के सक्रिय होते ही मंथन आरम्भ होता है , मंथन की प्रक्रिया ही चैतन्य शुद्ध भाव प्रस्फुटित कर शब्दार्थ की अभिव्यक्ति करती है । शब्दार्थ का भावपूर्ण लेखन ही कभी कहानी , कविता , लेख , व्यंग और कभी हमारे आध्यात्म को रचता है ।
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स्वर्णाक्षर

१- वातावरण के जहर से जादा जहरीला होता है मन का जहर ।
२- हमारा दिमाग खेत की तरह है , वैचारिक खाद डालने पर ही बुद्धि की फसल लहलहाती है ।
३- जीतना एक आदत है , दुर्भाग्य से हारना भी एक आदत है ।
४- भविष्य में जीने वालों के साथ यादों के बसंत नही होते ।
५- पुराणी यादों को मुस्कराहटों के साथ यद् रखें , आंसुओं से नही ।
६- मूर्खों का साथ और अपने पैर पर कुल्हाडी मरना एक सामान ही है ।
७- जो लोग बहाने बना लेते हैं, वे लोग कुछ और नही बना पाते।
८- अंधे के हाथ बटेर भी तभी लगती है , जब वह कोशिश करता है ।
९- समय तेजी से उड़ता है पर आप उसे पकड़ सकते हैं ।
१०- हमारा दिमाग और पैराशूट खुलने पर ही काम करते हैं ।

 

रेनू ....

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