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चेतना और शुद्ध विचार ही उर्जा रूप में हमारी सृष्टी के वाहक हैं । विचार के सक्रिय होते ही मंथन आरम्भ होता है , मंथन की प्रक्रिया ही चैतन्य शुद्ध भाव प्रस्फुटित कर शब्दार्थ की अभिव्यक्ति करती है । शब्दार्थ का भावपूर्ण लेखन ही कभी कहानी , कविता , लेख , व्यंग और कभी हमारे आध्यात्म को रचता है ।
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व्यक्ति के सामने जितनी विराट समस्या उपस्थित होती है और जब वह व्यक्ति किसी प्रकार साहस करके उसका समाधान करने के लिए प्रयास करता है , तब , निर्णय के क्षण से ही उसके व्यक्तित्व का प्रबल विकास होना प्रारम्भ होता है ।

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