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चेतना और शुद्ध विचार ही उर्जा रूप में हमारी सृष्टी के वाहक हैं । विचार के सक्रिय होते ही मंथन आरम्भ होता है , मंथन की प्रक्रिया ही चैतन्य शुद्ध भाव प्रस्फुटित कर शब्दार्थ की अभिव्यक्ति करती है । शब्दार्थ का भावपूर्ण लेखन ही कभी कहानी , कविता , लेख , व्यंग और कभी हमारे आध्यात्म को रचता है ।
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अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानांजन शलाकया । 
चक्छुरुन्मिलितम येन तस्मै श्री गुरवे नम : । । `


" भीड़ का सामना अकेले करने से वही व्यक्ति घबराता है जो खोया हुआ है स्वयम अपने ही विचारों की भीड़ में और जिसने अपने विचारों { एकाग्रता } की भीड़  में से चुनकर किसी एक विशिष्ट विचार को आगे लाने  का अभ्यास किया हैका वह पूरी दुनिया के सामने अकेला खडा रह सकता है ।"

Shri Shailendra Sharma
 
श्री मदभगवदगीता , एक योगिक व्याख्या
 
   
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