जिसे कहा जा सके , सुना जा सके वही कहानी होती है । प्राचीन गाथाओं को कथाओं में पिरोकर पुस्तकीय और मौखिक रूप से कहा जाता था , आज कल हम जीवनोपयोगी संस्मरणों को कहानी के रूप में पढ़ते और सुनते हैं ।
कहानी की रचना करते समय एक घटनाक्रम को सम्पूर्ण रूप से पाठक या श्रोता के सामने लयबद्ध प्रस्तुत किया जाता है ।
कहानी में भय , रोमांच , उल्लास , हर्ष , विषाद सभी भाव निपुणता से पिरोये जा सकते हैं । कथा का अंत सुखद एवं शिक्षाप्रद होना चाहिए ।