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चेतना और शुद्ध विचार ही उर्जा रूप में हमारी सृष्टी के वाहक हैं । विचार के सक्रिय होते ही मंथन आरम्भ होता है , मंथन की प्रक्रिया ही चैतन्य शुद्ध भाव प्रस्फुटित कर शब्दार्थ की अभिव्यक्ति करती है । शब्दार्थ का भावपूर्ण लेखन ही कभी कहानी , कविता , लेख , व्यंग और कभी हमारे आध्यात्म को रचता है ।
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जिसे कहा जा सके , सुना जा सके वही कहानी होती है । प्राचीन गाथाओं को कथाओं में पिरोकर पुस्तकीय और मौखिक रूप से कहा जाता था , आज कल हम जीवनोपयोगी संस्मरणों को कहानी के रूप में पढ़ते और सुनते हैं ।
कहानी की रचना करते समय एक घटनाक्रम को सम्पूर्ण रूप से पाठक या श्रोता के सामने लयबद्ध प्रस्तुत किया जाता है । 
कहानी में भय , रोमांच , उल्लास , हर्ष , विषाद सभी भाव निपुणता से पिरोये जा सकते हैं । कथा का अंत सुखद एवं शिक्षाप्रद होना चाहिए ।

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