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चेतना और शुद्ध विचार ही उर्जा रूप में हमारी सृष्टी के वाहक हैं । विचार के सक्रिय होते ही मंथन आरम्भ होता है , मंथन की प्रक्रिया ही चैतन्य शुद्ध भाव प्रस्फुटित कर शब्दार्थ की अभिव्यक्ति करती है । शब्दार्थ का भावपूर्ण लेखन ही कभी कहानी , कविता , लेख , व्यंग और कभी हमारे आध्यात्म को रचता है ।
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अपराध और अर्थशास्त्र


सृष्टी के आरम्भ से ही अपराध की उपस्तिथि को माना जा सकता है । अपराध की प्राचीनता वेद -पुराण के सामान ही है । प्राचीन अपराधों पर गहन शोध कर यह जानने का प्रयास किया गया है कि वैदिक युग से अब तक क्या अपराध सामान्य हैं और निरंतर नदिया से प्रवाहित हो रहे हैं और वे कौन से अपराध हैं जो , काल विशेष की उपज रहे हैं , उनके क्या दंड और प्रायश्चित व्यवस्था थी । 
आधुनिक परिवेश में हम कौन से अपराधों को साथ लेकर चल रहे हैं , क्या पीछे छूट गया , कौन से वैज्ञानिक , तकनीकी और नवीन अपराध हम सबके आस -पास जुड़ गए हैं , उनके कारण , लक्षण और समाधान पर एक दृष्टि डाली गई है । 
अपराध का सम्बन्ध विशेषतया अर्थ से ही होता है अत : " अपराध और अर्थ शास्त्र " पुस्तक का नाम सार्थक है । 
प्राचीन काल में अपराध को धार्मिक नियमों की अवहेलना स्वरूप किया गया पाप कर्म माना जाता था । देवता के क्रोध को पाप से जोड़ा जाता था । 
दंड व्यवस्था कड़ोर थी , सामाजिक व्यवस्था के अनुसार नियमों कल उल्लंघन पाप था । प्रायश्चित , मृत्यु दंड , अंग्विच्छेद जैसी सजा दी जाती थी । 
बौद्ध काल में चोरी , डकैती , बलात्कार , हत्या जैसे अपराध बढ़ गए थे । 
स्मृति काल में सामान्य नियमों की अवहेलना भी अपराध की श्रेणी में रखा गया , कठोर दंड व्यवस्था थी । 
सूत्र काल में पाप कर्म से छुटकारा पाने के लिए अर्थ दंड लागू किया गया , दान -दक्षिणा द्वारा दंड का विधान था । 
आचार्य कौटिल्य अर्थात चन्द्रगुप्त मौर्या काल में पाप और अपराध को व्याख्यायित किया गया । गंभीर से लेकर न्यून विषय को भी स्पष्ट किया गया । अपराधों की मौलिकता के साथ अर्थ दंड को राजकोष की वृद्धि का मुख्य साधन बनाया गया । शुल्क प्रणाली का प्रचलन आरम्भ हुआ । राजा ही न्याय प्रणाली का मुखिया होता था । 
मद्ध्य काल में मुग़ल सम्राट होने के कारण दंड का आधार इस्लामिक धर्म था । न्याय प्रणाली दूषित और पक्षपात पूर्ण थी । दंड का उद्देश्य जनता में भय और आतंक फैलाना था । अकबर ने क़ानून बनाया कि हिंदू को हिंदू धर्म के अनुसार दंड दिया जाय । प्राण दंड सम्राट कि अनुमति से घोषित किया गया । 
मराठा काल में सामाजिक रीति -रिवाजों व परम्पराओं को न्याय का आधार बनाया गया । पेशवा न्याय करता था । अपराधी दास या गुलाम की तरह ही दण्डित था । जादू करना अपराध माना गया । 
लॉर्ड मैकाले ने भारतीय दंड विधान को संग्रहित किया , सती प्रथा और भ्रूण हत्या को पाप माना गया । राजपूतानी बाल कन्या हत्या पर रोक लगा दी गई । लिखित दंड संहिता बनाई गई । अपराधी पर सुधारात्मक दृष्टि कौन अपनाया गया । बंदीगृहों को कारावास में परिवर्तित किया गया । चेतावनी , जुरमाना , कारावास , पैरोल , प्रोवेशन , मृत्युदंड , क्षमा दान आधुनिक न्याय प्रक्रिया के मुख्य अंग हैं । 
कोटिश : अपराधों की श्रंखला को कुछ प्रयासों के द्वारा कम किया जा सकता है । सद -आचरण द्वारा नैतिक शिक्षा , शिक्षा , योग विद्या , व्यायाम , खेल -कूद , कला , लघु -उद्योग आदि मनोवैज्ञानिक उपायों द्वारा अपराधी व्यक्ति में सुधर लाया जा सकता है । हमारा प्रयास है " अपराध और अर्थ शास्त्र " द्वारा आपराधिक कृत्यों में अवश्य ही क्षीणता आएगी । 

रेनू शर्मा ......

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