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चेतना और शुद्ध विचार ही उर्जा रूप में हमारी सृष्टी के वाहक हैं । विचार के सक्रिय होते ही मंथन आरम्भ होता है , मंथन की प्रक्रिया ही चैतन्य शुद्ध भाव प्रस्फुटित कर शब्दार्थ की अभिव्यक्ति करती है । शब्दार्थ का भावपूर्ण लेखन ही कभी कहानी , कविता , लेख , व्यंग और कभी हमारे आध्यात्म को रचता है ।
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बैल और गधा

 
एक किसान के घर में बैल और गधा दो जानवर थे , गधे का कोई काम नही था , कभी -कभी बच्चे उस पर सवारी करते थे , बैल को बहुत मेहनत करनी पड़ती थी , कभी गाड़ी में जुत कर शहर जाता था , कभी हल में जुत कर खेत जोतता था । गधा दिन भर खा -खा कर मोटा हो रहा था ।

एक दिन बैल ने गधे से कहा - यार!! तुम तो किस्मत वाले हो , आराम करते रहते हो , मैं काम करके परेशान हूँ । गधे ने कहा -लोग मुझे मूर्ख कहते हैं , तुम मुझसे अधिक मूर्ख हो , तुम मेरी बताई तरकीब पर अमल करो , तो काम से बच जाओगे । तुम झूंठ -मूंठ को बीमार होने का नाटक करो , खाना मत खाना , किसान मरे भी तो मत उठाना ।

बैल ने ऐसा ही किया , किसान ने सोचा - गधे को ही लेकर जाता हूँ , शायद तब तक बैल की तबियत भी ठीक हो जायेगी । अब गधा पछताने लगा । अब दिन भर हल जोतना पड़ रहा था , मार भी खानी पड़ रही थी सो अलग । गधे की बुरी हालत हो गई ।

दूसरे दिन भी यही हाल रहा । रात को उअसने बैल से कहा - भाई !! तुम अब बीमारी का नाटक छोड़ दो । क्योंकि किसान कह रहा था की तुम्हें वह कसाई को बेच देगा । उसे पैसों की सख्त जरूरत है । बैल ने खाना खाना शुरू कर दिया , गधे की जान बच गई , वह फ़िर से मस्ती करने लगा ।

सीधे व्यक्ति को गुमराह नही करना चाहिए ।

रेनू ....
 

 

 

 

 

 

 

 

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