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चेतना और शुद्ध विचार ही उर्जा रूप में हमारी सृष्टी के वाहक हैं । विचार के सक्रिय होते ही मंथन आरम्भ होता है , मंथन की प्रक्रिया ही चैतन्य शुद्ध भाव प्रस्फुटित कर शब्दार्थ की अभिव्यक्ति करती है । शब्दार्थ का भावपूर्ण लेखन ही कभी कहानी , कविता , लेख , व्यंग और कभी हमारे आध्यात्म को रचता है ।
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एक उम्र के बाद... ....

 
एक बार मैं ऊँची पहाडी पर बने देव स्थान पर गई , सुना था ईश्वर ऊपर रहता है , चलो देखें कितना ऊपर रहता है । हजार से अधिक सीडियां चढ़कर अथक परिश्रम के बाद ऊपर पहुँची तो , असीम आन्नद की अनुभूति हुई । मन्दिर प्रांगण में अपार उर्जा का भण्डार था , हम घूमते हुए मन्दिर के पीछे चट्टानों के पास चले गए , जहाँ से नीचे का दृश्य बड़ा मनोहर लग रहा था । मानो बड़े से कैनवास पर छोटे से खेत , घर , सड़क , गलियां , पेड -पौधे सब बने हैं । सब कुछ अकल्पनीय सा लग रहा था ।

तभी हमारे पास एक युगल आक़र बैठ गया , थोडी देर तक तो वे लोग चुप बैठे रहे , फ़िर उन्होंने एक दूसरे को उलाहने देने शुरू कर दिए , अपशब्द के बाद धिक्कारना भी शुरू हो चुका था । युवती जो उस युवक की पत्नी लग रही थी , आपा खोने लगी , क्यों तुम्हारे साथ जिंदगी बाँध ली मैंने ? चीख कर युवक से बोली - राकेश !! तुमने एक शब्द भी बोला तो , यहीं से कूद कर जान दे दूंगी , समझे !!

मैं , अवाक् थी , क्या करुँ ? कुछ समझ नही आ रहा था , कहाँ तो मैं , प्रकृति की सुन्दरता पर मोहित हो रही थी और अब , जिंदगी - मौत के जाल में फंस गई हूँ , धीरे से उठकर उसके पास गई , पहले पानी दिया , उसका नाम पूछा - वीथिका नाम था । फ़िर उसके पति से अलग ले गई , उसे समझाया बेटा !! धीरज रखो , बहस मत करो , शांत रहो , सोचो - कहीं तुमसे गलती तो नही हुई ? उसका हाथ मेरे हाथ में था , पसीने से लथपथ हो रहा था । वीथिका थोड़ा शांत हो गई । उसकी आँखें भर आईं , मुझे थैंक्स बोला और अपने पति के पास जाकर , घर चलने को कहा और सॉरी बोला । वे लोग चले गए ।

मैं , हतप्रभ सी, पूरा मंजर समझने का प्रयास करती रही , जितनी उर्जा मैंने अर्जित की थी , सब जाने कहाँ तिरोहित हो गई । शाम तक मेरा मन उदास रहा ।

अच्छा उत्तमा !! तुम मेरी जगह होतीं तो क्या करतीं ? मैं , यार !! पति -पत्नी के बीच क्या करती , अगर तुम्हें वीथिका फटकार देती , या बात ही न करती तब तुम क्या करतीं ? ऐसा नही है , उत्तमा ! पति के साथ क्या कोई अकेला नही हो सकता ? अरे ! तुम बताओ क्या करतीं ? मैं , तो डर कर ख़ुद ही भाग जाती । लडो मरो , मैं , चली । अगर मैं , युवती होती तो उस समय चुप रहती , लेकिन वापस आकर उस राकेश की ऐसी -तैसी कर देती । सार्वजनिक रूप से झगडा नही करती इतना तो पक्का है ।

सुनयना !! तुम भी तो वीथिका हो सकतीं थीं ? तब क्या होता ? हाँ , चुप रहने का प्रयास करती , अगर पानी सर से ऊपर जाने लगता तब , वापस चली जाती और आगे से कभी भी उस राकेश के साथ बाहर नही जाती । मैंने , धीरे से ख़ुद को देखा और सोचा- एक उम्र के बाद .....इंसान कितना बदल जाता है .मैं , बोल तो रही हूँ , क्या करती , क्या न करती । हजार तरह के नुस्खे बताने को तैयार हूँ पर जब हम युवा होते हैं तब बात कुछ और होती है ।

उत्तमा !! कोई स्टेशन आने वाला है , लगता है अब तुम्हारी धरा भी, थमने वाली है , अब इतना भी मजाक मत बनाओ , देखो स्टेशन पर लोगों को कितनी आपाधापी रहती है , हाँ , सुनयना !! मुझे याद है - उस दिन मैं , लोकल से घर जा रही थी ....

क्रमश
 

 

 

 

 

 

 

 

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