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चेतना और शुद्ध विचार ही उर्जा रूप में हमारी सृष्टी के वाहक हैं । विचार के सक्रिय होते ही मंथन आरम्भ होता है , मंथन की प्रक्रिया ही चैतन्य शुद्ध भाव प्रस्फुटित कर शब्दार्थ की अभिव्यक्ति करती है । शब्दार्थ का भावपूर्ण लेखन ही कभी कहानी , कविता , लेख , व्यंग और कभी हमारे आध्यात्म को रचता है ।
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कबसे

कबसे ,
भावों को
रूप दे रही हूँ ,
कल्पनाओं को
रंग रही हूँ ।
भावनाओं को
आकार दे रही हूँ ।
कब से ,
चिरागों को
अंधेरे में जला रही हूँ ।
शब्दों के जाल से
रिश्ते बना रही हूँ ।
कब से ,
दुःख -सुख के साये में ,
राह खोज रही हूँ ।
मन के मैल को ,
धोये जा रही हूँ ।
कब से ,
जीने के लिए
मंजिल तलाश रही हूँ ।

 

रेनू .....

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