vichar-manthan

चेतना और शुद्ध विचार ही उर्जा रूप में हमारी सृष्टी के वाहक हैं । विचार के सक्रिय होते ही मंथन आरम्भ होता है , मंथन की प्रक्रिया ही चैतन्य शुद्ध भाव प्रस्फुटित कर शब्दार्थ की अभिव्यक्ति करती है । शब्दार्थ का भावपूर्ण लेखन ही कभी कहानी , कविता , लेख , व्यंग और कभी हमारे आध्यात्म को रचता है ।
Home About Us Contact Us Releated Link English Books
 
कविता
कहानी
गुरुजी उवाच
लेख
आध्यात्म
चौपायातंत्र
हमारी पुस्तके
 
लोमडी और मुर्गा  
एक जंगली मुर्गा पेड पर बैठा बांग दे रहा था । मौसम बहुत अच्छा था और मुर्गे का पेट भी भरा हुआ था । तभी पेड के नीचे एक लोमडी आई , वह दो दिन से भूखी थी , मुर्गे को देखकर उसके मुंह मैं पानी आ गया । लोमडी ऊपर चढ़ नही सकती थी अत : उसने सोचा मुर्गे को नीचे उतरा जाय । उसने मुर्गे से कहा - देखो नीचे कितने दाने बिखरे हैं , फ़िर भी तुम ऊपर बैठे हो , मुर्गा बोला तुम भी तो मुझे खाने के लिए ही बैठी हो ।

लोमडी बोली - अरे ! तुमने जंगल की मुनादी नही सुनी , अब कोई एक दूसरे को नही खायेगा । भाईचारे से रहेंगे । अब , तुम डरो मत । मुर्गा बोला - यह तो अच्छा हुआ , अब कोई किसी से नही डरेगा । तुम भी तो शेर से डरती थीं । अब तुम भी आराम से रहना ।

लोमडी ने कहा - अब मुझे किसी का डर नही , कल ही तेंदुए के साथ हमारा खेल हुआ था । अब , तुम पेड पर ही क्यों बैठे हो , नीचे आ जाओ , हाँ , आता हूँ , अरे !! पीछे देखो - जंगली कुत्ते आ रहे हैं । लोमडी भागने लगी । अब , भाग क्यों रही हो ? इन कुत्तों का क्या भरोसा , तुम्हारी तरह मुनादी न सुन पाये हों तो , मुर्गा हंसने लगा । लोमडी की झूंठी बातें मुर्गे को फंसा नही सकी । धोखा देने वाला अपने ही जाल में फंस जाता है ।

रेनू शर्मा ...
 

 

 

 

 

 

 

 

Comments
CopyRight 2009 Vichar Manthan
Powered By : Expert Infotech Bhopal