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चेतना और शुद्ध विचार ही उर्जा रूप में हमारी सृष्टी के वाहक हैं । विचार के सक्रिय होते ही मंथन आरम्भ होता है , मंथन की प्रक्रिया ही चैतन्य शुद्ध भाव प्रस्फुटित कर शब्दार्थ की अभिव्यक्ति करती है । शब्दार्थ का भावपूर्ण लेखन ही कभी कहानी , कविता , लेख , व्यंग और कभी हमारे आध्यात्म को रचता है ।
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मजाक की हद

 
किसी नगर में एक रईस के पास एक हाथी था । उसकी देखभाल के लिए एक महावत भी रखा हुआ था । महावत अपने हाथी को नहाने और टहलाने के लिए रोज शहर की गलियों और सड़कों से ही ले जाता था । महावत जिस रस्ते से हाथी को ले जाता था , वहां एक दरजी की दुकान भी पड़ती थी । दरजी की दुकान सिले हुए कपडों से भरी रहती थी । महावत और दरजी एक ही गाँव के रहने वाले थे इसलिए उनकी दोस्ती भी सब जानते थे ।

महावत और दरजी हर दिन बातें किया करते थे , दरजी हाथी के लिए कभी केले , कभी रोटी , गुड और कभी हरी घास रख लेता था । हाथी अपनी सूंड दुकान की खिड़की से अन्दर करता और दरजी उसे कुछ न कुछ खाने को दे देता था । एक दिन दरजी को मजाक सूझ गई , उसने हाथी की सूंड में सुई चुभो दी , हाथी ने अपनी सूंड बाहर खींच ली । महावत इस बात से अनजान था । हाथी तालाब पर खूब नहाया और पानी को गन्दा करने के बाद , अपनी सूंड में भी भरलिया। वापस लौटते समय उसने दरजी की दुकान में सूंड डाली और और साडी दुकान में पानी छिटक दिया । सारे कपडे गंदे हो गए , दरजी भी गंदे पानी के कारण बौखला गया ।

महावत समझ गया कि जरूर दरजी ने कोई शरारत की होगी । कभी -कभी छोटी शरारतें भी महँगी पड़ जाती हैं । मजाक भी हद में होना चाहिए ।

रेनू .....
 

 

 

 

 

 

 

 

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