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चेतना और शुद्ध विचार ही उर्जा रूप में हमारी सृष्टी के वाहक हैं । विचार के सक्रिय होते ही मंथन आरम्भ होता है , मंथन की प्रक्रिया ही चैतन्य शुद्ध भाव प्रस्फुटित कर शब्दार्थ की अभिव्यक्ति करती है । शब्दार्थ का भावपूर्ण लेखन ही कभी कहानी , कविता , लेख , व्यंग और कभी हमारे आध्यात्म को रचता है ।
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नम्रता की जीत  
एक बार समुद्र ने वेत्रवती नदी से कहा -हे सरिते !! मैं समस्त नदियों के मधुर व्यवहार से पूर्ण संतुष्ट हूँ , सभी नदियाँ उपहार स्वरूप कुछ न कुछ अवश्य लाकर देतीं हैं । एक तुम ऐसी कंजूस हो , जो मुझे कभी कुछ नही लाकर देती हो । मुझे तुम्हारी कठोरता पर आश्चर्य होता है ।

नदी ने कहा - देव !! मैं कैसे कुछ ला सकती हूँ ?

समुद्र ने कहा - अरे !! तुम्हारे तीर पर बैंत के पेड लगे हैं , फ़िर भी एक भी बैंत लाकर नही दिया ।

नदी बोली - इसमें मेरा कोई कसूर नही , जब मैं प्रबल तेज के साथ बहती हूँ , तब सारे बैंत मुझे झुक कर प्रणाम करते हैं ।जब मेरा प्रवाह कुछ कम हो जाता है , तब वे ज्यों के त्यों खडे हो जाते हैं ।

समुद्र ने कहा - हे सरिते !! तुम ठीक कहती हो विनय और नम्रता में बड़ी शक्ति होती है । जो झुकना जानते हैं ,वे कभी नही टूटते ।

नम्रता शक्तिशाली और महान गुन है । नम्र व्यक्ति हमेशा विजयी होते हैं ।

रेनू ...
 

 

 

 

 

 

 

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