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चेतना और शुद्ध विचार ही उर्जा रूप में हमारी सृष्टी के वाहक हैं । विचार के सक्रिय होते ही मंथन आरम्भ होता है , मंथन की प्रक्रिया ही चैतन्य शुद्ध भाव प्रस्फुटित कर शब्दार्थ की अभिव्यक्ति करती है । शब्दार्थ का भावपूर्ण लेखन ही कभी कहानी , कविता , लेख , व्यंग और कभी हमारे आध्यात्म को रचता है ।
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सुबह सात बजे से चंपा घर का सारा काम सँभालने लग जाती है , चाय लेकर जगाती है मैडम !! उठो सबेरा हो गया ,तब जाकर आँख खुल पाती है , बच्चों का टिफिन बना दिया , जी ,साहब ने नाश्ता किया जी , दोपहर मैं आने का बोल रहे थे , अरे !! एक तो बज रहा है !! जल्दी से बाथरूम मैं घुस जाती है । चंपा नही होती तब क्या होता ? क्या इतनी देर तक सो पाती ? देर रात तक खाना - पीना चलता रहता है , कभी कोई साहब खाने पर आ गए , कभी कोई । क्या करुँ नींद भी तो पूरी नही हो पाती । सुदर्शन बहुत ध्य`ान रखते हैं । छोटे कपड़े धोकर बाल्टी बाहर सरका दी ,चंपा ले जा , सुखा दे । हर दिन इस तरह ही निकलता जाता है । दो बजे सुदर्शन आतें हैं अभी खाना नही हो पता , बच्चे भी आ जाते हैं , उनका पूरा काम चंपा ही करती है । जब काम जादा लगता है तब , सरजू भी साथ आता है , सरकारी दफ्तर मैं चपरासी है , लेकिन साहब का खाना बनाने आ जाता है ।
काफी समय से सरजू सुबह से आकर काम करता है और चला जाता है , चंपा नही आती ,कभी शाम को आती है , बता रही थी बच्चे अकेले थे , तो साथ ले आती । दुसरे दिन से बच्चे भी आने लगे , सुबह के नास्ते से लेकर रात के खाने तक सब यहीं चल रहा है , कपड़े भी सब बाँट लेतें हैं , चंपा अब कभी - कभी ही आती है , कह रही थी नई नौकरी करने लगी है , घर का खर्च नही चल पाता , ठीक है ,
कुछ समय बाद ... सरजू बिस्तर पर मेरी पायल राखी थी तुमने देखी , हाँ , सामने अलमारी मैं राखी हैं , लापरवाही का खामियाजा अब मिलने लगा है , कुछ गहने तो मिल ही नहीं रहे हैं , कई बार सुदर्शन की जेब से पैसे गायब हो जाते हैं , वो समझते हैं मैं निकाल लेती हूँ , कभी पूछते भी नहीं , मन्दिर की दराज मैं पैसे दाल देती हूँ तो वहाँ से भी गायब रहते हैं । कोई भी सामान तभी नही मिलता , जब कोई रिश्तेदार मिलने आता है , चंपा पर शक नही कर पाती ,सरजू तो बोल कर पैसे ले लेता है , चंपा !! रसोई मैं पैसे रखे थे तुमने लिए क्या ? मैं क्यो लेती मैडम !! ऊपर से भगवान देखता , सच बोलती बाई !! मांग लुंगी पर यैसे नही लेगी , अच्छा जा , पूछा ही तो है , क्यों नाटक करती है ।
सरजू बता रहा था , चंपा किसी बंगले पर खाना बनाती है पर वहाँ सिर्फ़ साहब ही रहता , कभी - कभी साहब के दोस्त भी खाने को आते , तो साहब जादा पैसा देता , रात को भी वहीं रुकने को बोलता , मना किया काम छोड़ दे नही मानती , बच्चे अंग्रेजी स्कूल मैं पढने जाते हैं , रोज नई साडी बदलती है , लड़की अंग्रेजी मैं बात करने लगी है , उसे भी अपने साथ काम पर ले जाती है , कह रही थी ,आज पार्टी है साहब ने कहा था बेटी को भी ले आना , मैडम !! मेरा कहा नही सुनती , क्या करुँ
दो दिन पहले पाँच हजार रुपये रखे थे अभी तो कोई मिलने भी नही आया , चंपा ही आई थी , सरजू को बता दिया की चंपा ही चोरी भी कर रही है , सरजू घर गया तो ताला लगा था , साहब के घर की चाबी भी चंपा के पास है लेकिन पीछे वाले दरवाजे की । दोनो रात भर घर नहीं आईं , पता चला की साहब गर्म मिजाज वाले हैं , चंपा और बेटी उनकी इश्क पोशी के लिए तैयार हो जातीं हैं , सोनू अब , बाहर भी जाने लगी है , साहब ने उसका काम चलवा दिया है , बेटी के मोबाईल पर पूरा सौदा पक्का हो जाता है , दोनो साहब के घर ही रहने लगीं हैं कभी , झुग्गी मैं आतीं हैं हाल चाल जानने के लिए , वे जानती हैं सरजू तो घोडे के पीछे लगी मक्खी सा भिनभिना रहा होगा , पर कोई बात नहीं ।
जिस्म और दौलत का खेल साहब की छत्र छाया मैं बेबाकी से चल रहा है , न समाज का भय , न परिवार का , सुबह का अख़बार उठाया तो चंपा का नाम लिखा था , पुलिस की छापा मारी का शिकार हो गईं थीं , जेल भेज दिया गया , क्या यही नई नौकरी करती थी सोनू और चंपा ? सरजू बुत बना खड़ा रह गया , शर्मिंदा था उस पत्नी के लिए जो अपनी ही बेटी को नर्क मैं झोंक चुकी थी , अब तो कोई अपना भी नहीं और न , अपना परिवार रहा , दस बरस बाद पता चला , चंपा तो नही रही पर सोनू ने किसी बुढ्ढे से शादी करली है । जाने कोन सा रास्ता होगा , उसके आगे औरत जाने का साहस नही करे , मर्यादाओं का मजाक नही बना पायेगी ।

 
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