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पलायन

 
अभी तक कोई नही जानता था कि बुनेर भी कोई जगह है , जहाँ जिन्दा इन्सान रहते हैं , जबसे पाकिस्तानी अफसरों ने आतंकी लोगों के नाम पर सबको निशाना बनाना शुरू किया है , हजारों लोगों की सांसें थम गईं हैं । हमने क्या बिगाडा ? जैसे -तैसे काम करके जीवन यापन कर रहे थे , बड़ी मुश्किल से सर पर छत बना पाये थे , तब तक लोगों का हुज्जूम उमड़ पड़ा , भागो सैनिक आ रहे हैं , अमेरिकी जहाज बम गिरा रहे हैं । हम तो बाई सा !! कुछ समझ भी नही पाए थे , बेटे बेटी को गोद उठाया , कुछ कपडे पोटली में बांधे , उसी में सात हजार रुपये जो हमारी जीवन भर की कमी थी छुपा लिए और भाग लिए ।

बाई सा !! साहिल ने कहा था - जब मौत आएगी तब ,कहीं भी आ सकती है ,हम यहीं रहते हैं लेकिन बच्चों की खातिर हम भाग लिए । एक टूटी सायकल थी , कहाँ तक हमारा साथ देती तो उसे घर पर ही छोड़ दिया । बाई सा !! बेगम ने पन्द्रह रोटियां और आचार रख लिया था , तो हम जिन्दा बच सके वरना , आठ दिन तक लोगों को भटकते हो गया , एक दाना मुंह को नही लगा ।

साहिल की आँखें गीली हो गईं , दाढ़ी बढ़ गई है , सर के बाल भी लंबे हो गए हैं , पीछे बाँध रखे हैं । दो जोड़े कपडे पहन भी रखे हैं , लगता है जूते कई दिनों से खोले नहीं , बच्चों का भी यही हाल है । तुम बेगम क्यों बुलाते हो इसे ? इसका नाम तो शानो है , बाई सा !! एक जगह पुलिसिया काफिला जा रहा था , हमें रोककर पूछने लगे , कौन हो ? कहाँ जा रहे हो ? जबकि हजारों लोग भागे जा रहे हैं , साथ में कौन है ? मैं हक्का -बक्का सा हो जाता हूँ , शानो कहता तो ले जाते छीनकर , मेरे मुंह से बेगम निकल गया , बीमार है टीबी हो गई है , टीबी का नाम सुनते ही वे लोग आगे बढ़ गए । मैंने देखा - शानो के आंसू बह रहे थे , उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया था । बच्चे को सीने से लगाये थर-थर कांप रही थी । मेरा तो पसीना छूट गया बाई सा !! खींच ले जाते तो मैं , क्या करता ?

बच्चों को सर पर बिठाये मैं , चलता जा रहा था , शानो कपडों का बोझ उठाये थी , पैदल भी लोगों का जाना जारी था , लोग रास्ता बदल रहे थे , सड़क छोड़कर पगडण्डी , खेत , गाँव से होकर निकल रहे थे , बाई सा !! मैंने सोच लिया था सड़क से अलग नही होना है , ऐसा लग रहा था मनो भारत पाकिस्तान का बंटवारा फ़िर से हो रहा है , पहचान वाले भी कोई बात करने को राजी नही थे , कहीं कुछ सहायता न मांगने लगें । हमारे गाँव का एक चौदह साल का लड़का अपने परिवार से बिछुड़ गया था , वो हमारे साथ हो लिया था , भाईजान !!भाईजान !! कहकर ही उसने मारडाला , मेरा कलेजा चीर दिया । शानो ने उसे रोटी खिला दी , तबसे असलम को वही संभाल रहा है , एक बच्चे का नाम हमने महावीर रखा है लेकिन वीरा कहते हैं ।
बाई सा !! हमें तो यह भी नही पता था , कहाँ जाना है ? बस चलते ही जा रहे थे , किसी ने बताया था कि आगे हसन अब्बाल में श्री पंजा साहिब गुरुद्वारा है ,वहां रहने को मिल सकता है , लेकिन वहां भी हजारों लोग पहुँच चुके हैं , पचास -साठ किलोमीटर पैदल चलाना कोई आसान बात नही होती ,रात में हम लोग पेडों के झुरमुट में थोडी देर के लिए रुक गए थे , बच्चे गोद में सो गए तो, क्या करते ? बेगम ने कहा था - जो होगा देखा जाएगा , रुक लेते हैं । हमारे साथअकरम भी था , उसने झाड़ को साफ़ कराया , माचिस जलाकर कीडा -मकोडा देख लिया और पोटरी के सहारे रेत में बेगम की गोद में वीरा सो गया , असलम और अकरम मेरे सहारे सो गया , बच्चे तो थक कर चूर हो चुके थे , बेहोश होकर सो गए । हमारा वदन टूट रहा था , जोड़ -जोड़ तड़क रहा था , शरीर भय से कांप रहा था , पलक झपकते ही लगता कोई आ तो नही रहा , रात भर नींद से झगडा चलता रहा ।
बाई सा !! एक बार मेरी नींद खुली मेरे दोनो हाथ जमीन पर पड़े थे , पैर जमीन पर पसरे थे , बच्चे इधर -उधर लुढ़क रहे थे , शानो गायब थी , मैं , करंट लगा इंसान सा छिटक गया , किसी के आने की आहट हुई धीरे से आवाज निकली शानो !! जी मैं हूँ , सुनाई दिया । बड़ी जलन हो रही है, बारह घंटे से हमने पानी नही पीया है , अभी न जाने कितना चलाना पड़े । सुबह होने दे , फ़िर देखता हूँ । बाई सा !! पानी का तो , ध्यान ही नही दिया । बस चल दिए । जब जीना -मरना नही पता तब , पानी की क्या सुध !!
आकाश मैं रौशनी छाने लगी , चार खेत दूर एक कुँआ नज़र आया , देखने से तो पुराना लग रहा था , पास ही एक झोपडा भी था । रात को एक ट्रक भी सड़क पर खड़ा था , कुछ लोग इधर आते दिखे भी थे , लेकिन हमारी तो , डर के मारे सिट्टी -पिट्टी गुम थी , देखा तक नही कि उधर क्या चल रहा है । शानो के दो दुपट्टे लेकर मैं उधर चल दिया , बच्चे वहीं झाड़ में छुपे थे , कुंए के पास रस्सी -बाल्टी लुड्की पड़ी थी । मैं, बड़ा खुश हुआ , चुपके से पानी लेकर बच्चों को पिला दूंगा , झाँककर देखा तो , कुछ तैरता हुआ दिखाई दिया , मैं , भौचक रह गया , एक सर पानी मैं डूबा हुआ था , मेरे पैर काँप गए , इधर -उधर देखा और दौड़ लिया , साँस धौकनी सी चल रही थी , जल्दी से शानो को उठाया और बोला भागो यहाँ से !! बच्चे सन्न रह गए , क्या हुआ अब्बा !! कुछ नही चलो , हम लोग बाहर निकले और सड़क पर आ गए । इक्का -दुक्का लोग सड़क पर जा रहे थे ।
बाई सा !! हम लोगों के पीछे लग गए । चालीस साल का मर्द मैं , साठ बरस का सा लग रहा हूँ । परिवार न होता तो , घर भी नही छोड़ता । पर ,औरत की आबरू के लिए दर-बदर भटकना पड़ रहा है । अभी भी कोई भरोसा नही, कब, क्या हो जाय ?
सबेरा हो गया था , हम एक बस्ती के पास पहुँच गए ,वहां शानो ने पानी पीया , बच्चों ने रोटी खायी और आगे चल दिए । सब डरे हुए थे ,कोई किसी से बात नही करना चाहता था , न जाने इन्सान के रूप में क्या निकल आए ? अभी करीब आठ किलोमीटर ही चले थे कि सड़क के किनारे एक औरत दर्द से करह रही थी , शायद उसे बच्चा होने वाला था , शानो की आँखें भर आईं, बोली - वीरा के अब्बा !! हम रुकें क्या ? मैं , निरुत्तर था क्योंकि सभी लोग अपनी जान और आबरू बचने के लिए भागे ही जा रहे थे । हम भी भयभीत थे । शानो मुंह में दुपट्टा ठूंस कर रो पड़ी , औरत का दर्द एक औरत ही समझ सकती है , बेचारी तड़फ कर जान भी दे सकती है , हम क्या करें ? रुकने का मतलब था हम भी किसी मुसीबत में आ सकते हैं । हमें ख़ुद से ही शर्म आ रही थी , क्या करते ?
दोपहर होते -होते हम दर्रे के इलाके में आ गए , अगर सड़क को छोड़ा तो ,सीधे मौत के मुंह में जाना पक्का था ,आगे -पीछे गाडियां दौड़ रहीं थीं , जिसे जो साधन हाथ लगा उसी से भाग रहा था , कितने लोगों के सामने गुहार लगाई, बच्चों को ही बिठा लें , कोई तैयार नही हुआ , लोग कह रहे थे अभी बीस किलोमीटर और चलना होगा , पैरों में छले पड़ गए थे , शानो के पैर तो अकड़ गए थे , बच्चों के पैर सूज गए थे , चलते रहे , क्या करते ?
थोडी दूर पर ट्रकों का काफिला चला आ रहा था , तलाशी होने लगी , दिखाओ , क्या ले जा रहे हो ? हथियार तो नही हैं ? एक सैनिक शानो को देख रहा था , बुरखा उठाकर , हाथ मसल कर देख लिए , शानो की साँस भी नही चल रही थी , उसे डर था ,कहीं पोटली में रखे पैसे न निकल लें , पत्थर की मूरत सी खड़ी रही । ट्रक पर बिठाकर चल दे तो , हम क्या कर लेते , रोटियां बिखर गईं , बच्चों की आंखों में आंसू आ गए । अगर ,रोटी छीन ली तो ? हम लोग वहां से आजाद हो गए । पैरों में कपडे बाँध लिए थे । अकरम अभी भी हमारे साथ था । अब , हमें छोड़कर कहीं जा भी नही सकता था ।
वीरा और शानो बुखार में तपने लगे , लोग बता रहे थे गुरुद्वारा आने ही वाला है , गाड़ियों की कतारें दिखाई देने लगीं । औरतें और बच्चे सड़क के किनारे चादर तान रहे थे । हिम्मत बढ़ रही थी । बच्चों को एक किनारे से बिठाकर गुरूद्वारे की तरफ़ भाग लिया , वहां लंगर चल रहा था , जाकर पानी पी लिया और बच्चों के लिए चना पूडी लेकर आ गया , रात होने से पहले ही ,वहां बरांडे में बच्चों के लिए जगह मिल गई , ऑफिस के प्रबंधक बलवंत सिंह जी के पैर पकड़ लिए तो काम के बदले रात काटने को मिल गई , वहां के डॉक्टर के पास लम्बी कतार लगी थी , किसी तरह दवा मिल गई , हांफता हुआ में बच्चों के पास पहुँचा तो , वीरा बेहोश पड़ा था , साहब के पैर पकड़ लिए , मेरे बच्चे को बचा लो , डॉक्टर से कहकर बोतल चढवा दी , हमारी जमा पूँजी धीरे -धीरे ख़तम होने लगी , रात के दो बजे लंगर की कारसेवा में जाकर बर्तन साफ़ करने लगा ।
अकरम शानो का माथा सहला रहा था , वीरा को होश नही था , बाई सा !! हमारे ऊपर खुदा की नहमत थी जो , मेरे बच्चे जिन्दा रहे । हजारों की भीड़ में , हम भी तकलीफों का सामना कर रहे थे , बच्चों के कारण साहब ने वहीं रहने दिया । दिन रात काम करते, फ़िर रात को खाना मिल पाता । हर दिन शानो की आबरू को बचाना पड़ता । औरतों के सैलाब में गम होकर उसे भी साग -भाजी का काम करना पड़ता , बाई सा !! एक दिन अकरम कहीं चला गया , कह रहा था घर वालों को ढूढने गया है । किसी ने बताया ,एक ट्रक वाले के साथ चला गया है ।
आतंकियों के भय ने सबको मरकर जीना सिखा दिया है । घर से, बंजारे से, हम लोग, निकल पड़े हैं , अब , जाने कहाँ जीवन की शाम होगी ।
रेनू ....
 
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