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चेतना और शुद्ध विचार ही उर्जा रूप में हमारी सृष्टी के वाहक हैं । विचार के सक्रिय होते ही मंथन आरम्भ होता है , मंथन की प्रक्रिया ही चैतन्य शुद्ध भाव प्रस्फुटित कर शब्दार्थ की अभिव्यक्ति करती है । शब्दार्थ का भावपूर्ण लेखन ही कभी कहानी , कविता , लेख , व्यंग और कभी हमारे आध्यात्म को रचता है ।
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पश्चात्ताप

 
नन्ही गिलहरी गोपा इधर -उधर फुदक कर जगल के रास्तों को याद कर रही थी । हर दिन अपने दोस्तों के साथ खेलने में समय निकालती है , कभी नृत्य करती है , कभी संगीत छेड़ती है । गोपा की सबसे प्यारी सखी सोना बुलबुल है , एक दिन बुलबुल ने बताया कि पास के गाँव में एक किसान रहता है , उसकी पत्नी घर के पिछवाडे दाना -पानी रखती है । वहां जाकर खूब मजे करेंगे । गोपा तैयार तो हुई मगर माता -पिता से आज्ञा लेना टेडी खीर था ।

गोपा अपनी मस्ती में चूर उछलती जा रही थी कि मेढ़क हीरा से टकरा गई , मेढ़क ध्यान में था तो भड़क गया । देख कर नही चल सकती ?गोपा ने मुंह चिडाया और भाग गई । हर दिन गोपा किसी न किसी पडौसी से भीड़ जाती , सोना ने कई बार समझाया पर कोई असर नही हुआ ।

एक रोज सोना के साथ गोपा गाँव तक चली गई , ढेर सारा दाना पानी देखकर दोस्तों का झुंड वहां हर दिन जाने लगा । शैतान गोपा धीरे से किसान के घर में घुस गई और मक्का के भुट्टे से दाने कुतरने लगी । अचानक घर में गिलहरी देख किसान की पत्नी नाराज हो गई । हड़बड़ी में गोपा के गले में दाना अटक गया । गोपा बाहर भागी तबतक , सोना उड़ चुकी थी । उसका दम घुट रहा था । किसी तरह छलांग लगाकर उडी तो , गड्डे में गिर गई । वहां हीरा मेढ़क अपने दोस्तों के साथ दावत उड़ा रहा था , आज उन्हें ढेर सारे कीडे मकोडे दावत में सर्व किए गए थे । गोपा की हालत देखकर हीरा मुस्कराया , क्यों साहबजादी !! कैसे ? गोपा की आवाज नही निकली और बेसुध हो गई ।

हीरा दोस्तों के साथ गोपा को जंगल तक लाया , सोना भी रास्ते में मिल गई । सब लोग गोपा को वैद्य मूला बन्दर के पास ले गए । गले से मक्के का दाना निकाला गया , वैद्य ने बताया कि गोपा दो दिन तक बाहर नही जा सकती । सबने मूला का शुक्रिया अदा किया ।

घर पर गोपा अपने दोस्तों के व्यवहार की समीक्षा करती रही ।मैंने सबको परेशान किया फिरभी हीरा ने मेरी मदद की । अब मैं प्रण करती हूँ , कभी किसी को दुखी नही करुँगी , अभद्र व्यवहार नही करूंगी । पश्चात्ताप के दिन बिता कर गोपा स्वस्थ्य हो गई ।

रेनू .....
 
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