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चेतना और शुद्ध विचार ही उर्जा रूप में हमारी सृष्टी के वाहक हैं । विचार के सक्रिय होते ही मंथन आरम्भ होता है , मंथन की प्रक्रिया ही चैतन्य शुद्ध भाव प्रस्फुटित कर शब्दार्थ की अभिव्यक्ति करती है । शब्दार्थ का भावपूर्ण लेखन ही कभी कहानी , कविता , लेख , व्यंग और कभी हमारे आध्यात्म को रचता है ।
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हमारी पुस्तके
 

 

रंग सा बरस रहा है  
हवाओं से
बात करती
गति ,
मनो रेस
खेल रही है ।
नदी , झरने
ताल , तलैया
पेड , पौधे
सब ,
दौड़ रहे हैं
साथ -साथ ।
यह , दृष्टि भ्रम है
मैं , जानती हूँ ।
मेरे रुकते ही
सब ,
थम जाते हैं ।
मैं , बहक रही हूँ ।
दूर फिजाओं में
बादल घुमड़ रहे हैं
रंग सा बरस रहा है ,
भीतर बैठी में ,
अन्दर तक
भींग रही हूँ ।
क्षितिज लापता सा
हो रहा है ।
मेरे पास ही प्रकृति
कहकहे लगा रही है
मनो ,
संगीत छेड़ दिया हो ,
गति थम गई है ।
रंग सा बरस रहा है
हमारे आस -पास ।
रेनू शर्मा .......
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