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चेतना और शुद्ध विचार ही उर्जा रूप में हमारी सृष्टी के वाहक हैं । विचार के सक्रिय होते ही मंथन आरम्भ होता है , मंथन की प्रक्रिया ही चैतन्य शुद्ध भाव प्रस्फुटित कर शब्दार्थ की अभिव्यक्ति करती है । शब्दार्थ का भावपूर्ण लेखन ही कभी कहानी , कविता , लेख , व्यंग और कभी हमारे आध्यात्म को रचता है ।
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टूटना मत  

जब , छोटी थी तब ,

मदमस्त , बेखबर

तितली सी ,

कभी इधर

कभी उधर ,

मंडराती थी ।

कभी भाई से लड़ना ,

सखी से मिलना ,

माँ से उलझना ,

पिता से अटकना

सब ,

बेलगाम चलता था ।

अब , जब , पीहर

पीछे छूट गया है ,

तब ,

माँ , कहती है -

वे ही तुम्हारे माता -पिता हैं

पिता कहते हैं -

वही तुम्हारा घर है ,

भाई कहता है -

टूटना मत ,

सखी कहती है -

बिखरना मत ,

मैं , कहती हूँ -

मुझे पहले बताया होता ,

क्या , नही करना ।

क्यों ?

मैं , फ़िर से

बेटी नही बन सकती ।

रेनू ....

 

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