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चेतना और शुद्ध विचार ही उर्जा रूप में हमारी सृष्टी के वाहक हैं । विचार के सक्रिय होते ही मंथन आरम्भ होता है , मंथन की प्रक्रिया ही चैतन्य शुद्ध भाव प्रस्फुटित कर शब्दार्थ की अभिव्यक्ति करती है । शब्दार्थ का भावपूर्ण लेखन ही कभी कहानी , कविता , लेख , व्यंग और कभी हमारे आध्यात्म को रचता है ।
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वात्स्यायन आओ न !!

 
सदियों पूर्व शिक्षा के क्षेत्र में आचार्य वात्स्यायन ने यौन शिक्षा पर आधारित अपना महान ग्रन्थ " काम शास्त्र " समाज को समर्पित कर एक नया अध्याय शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में जोड़ दिया था । आचार्य वात्स्यायन के बारे में पता चलता है कि वे एक महर्षि थे , उनके पास शिष्य शिक्षा प्राप्त करने आश्रम में आया करते थे । वात्स्यायन खोजी प्रवृति के ज्ञानी व्यक्ति थे ।

तत्कालीन समाज में राजाओं की विलासी प्रवृति सर्वाधिक उच्च स्थान पर थी । राजा ,प्रजा व समाज के विकास से अधिक विलासिता पर ध्यान देते थे , महाकवि शूद्रक रचित " मृच्छ्कतिकम " से पता चलता है कि वेश्याओं को राजाश्रय प्राप्त था , वे वैतनिक कर्मचारी होते थे । वेश्याओं को खुलेआम रतिसुख प्राप्त करने का अधिकार था , वैश्याएँ काम शास्त्र में पारंगत होती थीं ।

समझ सकते हैं कि हमारे समाज का एक वर्ग वासना में लिप्त रहकर काम विषयक शोध करता था और योग , ध्यान , आध्यात्म से उसे जोड़कर उच्चता प्रदान करता था । वात्स्यायन का " कामशास्त्र " इसका उदहारण है । प्रकृति के साथ मानवीय तादात्म्य स्थापित करना , विलास का स्थान , भाव ,विचार , पशु -पंछी सब काम भाव के उद्दीपन का काम करते हैं । उन्होंने गंभीरता से भावों -विचारों पर मनन चिंतन कर अपने ग्रन्थ का निर्माण किया था ।

वैभव सम्पन्न राजा विशाल मंदिरों , भवनों का स्थापत्य करवाते थे , उनकी प्रजा को रोजगार मिले , राजा के वंश का उल्लेख शिलाओं कि नसों में प्रवाहित हो इसके लिए वे भव्य मंदिरों , चेत्यों का निर्माण करवाते थे । कहा जाता है कि पृथ्वी पर जब , आध्यात्म की अधिकता हो गई तब, देवता भी अपने लोकों में अपने तेज की वृद्धि करने के लिए ध्यान मग्न हो गए । पृथ्वी पर उनका आगमन अवरुद्ध हो गया , स्रष्टि में स्थिरता आ गई तब , देवताओं को पृथ्वी पर आकर्षित करने के लिए आदमकद पशन प्रतिमाओं के युगल शिल्प रतिक्रिया लिप्त , विलासिता युक्त , मंदिरों , प्रसादों की भव्यता को दर्शाते हुए उत्कीर्ण कराये गए । देवताओं का आह्वाहन किया गया

काम भाव को जाग्रत करने का असर कलियुग में स्पस्ट रूप से दिखाई देता है । हम उन मंदिरों को आज भी देख और समझ सकते हैं । समाज की विक्र्तियाँ भी समझ आती हैं ।

आज शिक्षा का विकास सर्व साधारण के लिए किया जा रहा है , फ़िर भी , समाज से अज्ञानता दूर होने के स्थान पर और पनपती जा रही है । कहा जाता है कि जब व्यक्ति उन्मादी या पागल हो जाता है तब , पशुवत व्यवहार करने लगता है । पशुवत का आशय है बिना सोचे समझे किसी काम को करना । शिशु के बोलना शुरू करते ही हम नैतिक मूल्य सिखाने लगते हैं , बड़ा होते ही भारतीय मूल्यों को भुला देता है ।

सम्पूर्ण विश्व में भारतीय मूल्य , सभ्यता , संस्कृति की क़समें खाई जाती हैं , पर कानून विद अपराधों के संरक्षण के लिए ही विधान बना देते हैं । काम भाव की विकृति भी हजारों अपराध पैदा करती है , उसके लिए दंड विधान को लचीला बना देना भी अपराध है । बालकों के प्रति किए गए अपराधों के लिए दंड का संशोधन कर , पाप कृत्य को ही मान्यता प्रदान कर दी गई है । भारतीय युवकों को बरगला कर भारतीयता की धज्जियाँ उडाई जा रही हैं । भारत को फ़िर से गुलाम बनने के प्रयास किए जा रहे हैं ।

स्वछंदता और आजादी के नाम पर शारीरिक , मानसिक पवित्रता का नाश किया जा रहा है । हमारे कानून को ही बदलवाया जा रहा है । यह भारत के लिए अभिशाप साबित हो सकता है । किसी षड़यंत्र के तहत ही इस प्रकार के कानून लागु किए जा रहे हैं । वासना की हदें पार की जा रही हैं । कहाँ गए ? भारतीय संस्कृति के रखवाले । क्या हो रहा है ? वात्स्यायन आज होते तो शर्म से सर झुका लेते , शायद चुल्लू भर पानी की मांग कर बैठते । किसी ने ठीक ही कहा है - जब , विपत्ति आती है तब , मति भ्रष्ट हो जाती है ।

रेनू शर्मा ...


 

 

 

 

 

 

 

 

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